“पत्रकारिता पहले दुरूह और अब दुष्कर”

"पत्रकारिता पहले दुरूह और अब दुष्कर" प्रस्तुति: मनोज कुमार सिंह, अम्बालिका न्यूज डेस्क, खुशी और गम दोनों मौकों पर पत्रकारों की उपस्थिति आम लोगों को उद्वेलित करती हैं। गमजदा और खुशनुमा माहौल को अपने शब्दों और कैमरों से बखूबी उकेरना पत्रकारों के ब्यक्तित्व की वास्तविक पहचान हुआ करती हैं।संकल्पित जीवन और तलवार की धार पर चलने की जीवटता के बगैर पत्रकारिता असंभव है। आजादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारिता परतंत्रता से प्रतिरोध का हथियार थी। दिलो दिमाग पर देश भक्ति का सवार जुनून अपना सर्वस्व न्योछावर करने की तमन्ना का उबाल था।…

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“पत्रकारिता पहले दुरूह और अब दुष्कर”

मनोज कुमार सिंह: पत्रकार

प्रस्तुति: मनोज कुमार सिंह,

अम्बालिका न्यूज डेस्क,
खुशी और गम दोनों मौकों पर पत्रकारों की उपस्थिति आम लोगों को उद्वेलित करती हैं। गमजदा और खुशनुमा माहौल को अपने शब्दों और कैमरों से बखूबी उकेरना पत्रकारों के ब्यक्तित्व की वास्तविक पहचान हुआ करती हैं।संकल्पित जीवन और तलवार की धार पर चलने की जीवटता के बगैर पत्रकारिता असंभव है।
आजादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारिता परतंत्रता से प्रतिरोध का हथियार थी। दिलो दिमाग पर देश भक्ति का सवार जुनून अपना सर्वस्व न्योछावर करने की तमन्ना का उबाल था। आपातकाल के दौरान पत्रकारिता का स्वरूप संविधान बचाने की लड़ाई के रूप में परिवर्तित हो गया। 25 वर्षों की अवधि में लोगों ने पत्रकारिता के दोनों स्वरूपों का गहराई से मूल्यांकन किया। दोनों परिस्थितियों में पत्रकारों ने देश और समाज के प्रति समर्पण का अतुलनीय प्रदर्शन किया।

इस दौरान अनेक पत्रकार असमय काल कवलित भी हुए। अनेक परिवार बर्बाद हुए। सरकारों ने तब भी पत्रकारों व उनके परिजनों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय नही दिया। देश में लोकतंत्र की पुर्नस्थापना के बाद प्रबंधन की शोषण की नीति का आगाज होता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि जो पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर और हाड़तोड़ मिहनत करता होगा और बगैर पारिश्रमिक के प्रतिदिन 25 से 50 किमी साइकिल चलाकर आम लोगों की पीड़ा को अखबार के पन्नो तक पहुंचाता होगा। यही नही अपने खून पसीने से सींचकर कर सरकार तथा समाज को आइना दिखाने वाले उन पत्रकारों की हालत तब और दयनीय हो जाती हैं जब उसे असामाजिक तत्वों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। और इस विपरीत हालात में प्रबंधन उसे उसका वाजिब हक देने के बजाय उसे अपना मानने तक से इनकार कर देता है।

सरकार उसे सरकारी कर्मी मानने से मुकर जाती है। और समाज उसे गले लगाने के बजाय उसकी उपेक्षा करती हैं उसपर तरह तरह की तोहमतें लगाती है। तब एक पत्रकार की मनःस्थिति क्या हो सकती हैं। आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। समाजवाद से निकलकर देश पूंजीवाद की राह पर चल पड़ा है। प्रबंधन सरकार और पूंजीपतियों के हाथों का खिलौना बनकर रह गईं हैं। विचार उदगार और संकल्प इतिहास के पन्नो में दफन होने के मुकाम पर हैं। इस सबके बावजूद अपने
मान अपमान से परे होकर भी पत्रकार आपके सम्मुख खड़े हैं। पत्रकार कभी बिक नही सकता और बिकने वाला कभी पत्रकार हो ही नही सकता। शब्दजाल में फंसाकर अर्थ का अनर्थ करने की एक परंपरा सी चल पड़ी है। आजाद भारत के सात दशक बीत चुके हैं। दमन घुटन और शोषण के शिकार पत्रकारों को अब तो आजादी मिलनी चाहिए। पत्रकारों के दायित्व का दायरा निर्धारित किया जाना चाहिए। उनके सामाजिक आर्थिक हालातों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। पत्रकारों के प्रति सरकारों की नीति और नीयति व नजरिया का खुलासा होना चाहिए। अब वह वक्त आ गया है लाल किले की प्राचीर से सम्पूर्ण भारत में एक साथ पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की घोषणा होनी चाहिए।
सादर आभार
मनोज कुमार सिंह
राष्ट्रीय प्रवक्ता
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति।

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