अध्यात्म: धार्मिक अनुष्ठान में त्रुटि का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता जरूर है: मनोज सिंह!!

अध्यात्म: धार्मिक अनुष्ठान में त्रुटि का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता जरूर है: मनोज सिंह!!

नेक नियति से किया गया त्रुटि रहित अनुष्ठान ही श्रेयस्कर

प्रस्तुति: अम्बालिका न्यूज सेंट्रल डेस्क,

धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करने में अक्सर हम छोटी मोटी भूल कर बैठते हैं और अनायास ही हमें ईश्वर के कोप का शिकार होना पड़ता है। हालांकि प्रकृति प्रदत्त ईश्वरीय दंड हमारे लिये सबक बनकर हमें आगाह भी करती हैं। यह महसूस करने की बात है। पिछले तीन अनुष्ठानों के आयोजन में हुई त्रुटि के परिणाम स्वरूप आंखों देखी तीन घटनाओं ने हमारी आत्मा को झकझोर कर रख दिया और ईश्वरीय शक्तियों का हमें सचमुच अहसास हो गया।
पहली घटना लगभग 20 वर्ष पुरानी है। हमारे गांव बहोरन सिंह के टोला स्थित मां काली मंदिर परिसर में चौबीस घण्टे का अखंड अष्टयाम आयोजित किया गया था। तब शायद हमें विधि विधान में त्रुटि का अहसास न हो सका। पूजन विधि प्रारम्भ होने से महज कुछ ही देर पहले सादर आमंत्रित डुमरी के एक सिद्ध व बृद्ध ब्राम्हण ने हमें आगाह किया कि यहां एक अनहोनी के खतरे का अंदेशा है जिसे टालने के उद्देश्य से मैं ईश्वर की आराधना कर रहा हूँ।

उधर पलक झपकते ही लाउड स्पीकर के चोंगा का यूनिट काफी ऊंचाई से बच्चों के झुंड के बीच अचानक आ गिरा। वजनी यूनिट गिरने से एक बच्चे के पैर का निचला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त व लहूलुहान हो चुका था। उसे तत्काल हॉस्पिटल ले जाया गया। काफी मशक्कत के बाद डॉक्टरों ने उसे बचा लिया। अनुष्ठान निर्वाध सम्पन्न हो गया। खतरे के पूर्वानुमान से आगाह करने वाले स्वर्गवासी सिद्ध महात्मा को दिल से नमन।
दूसरी घटना। मांझी प्रखंड मुख्यालय स्थित मनोकामना सिद्ध बजरंग बली के मंदिर के पास हनुमत ध्वज गाड़ने में उतपन्न तकनीकी गड़बड़ी अथवा यों कहें कि ध्वज स्थापना में परिस्थिति वश हुए तीन दिन के विलम्ब की वजह से घटी अभूतपूर्व घटना से यकायक धड़कन थम सा गया।

वस्तुतः हनुमत ध्वज स्थल के ऊपर पंडाल बना दिया गया था इस वजह से तीसरे दिन हम तीन लोग ध्वज गाड़ने पहुंचे थे। मेरे साथ मेरा बेटा आनंद तथा गौरी गांव का राहुल वहां मौजूद था। तारकेश्वर तिवारी मंत्रोच्चार कर रहे थे।

परंतु शायद विधि विधान में हुई त्रुटि से खिन्न पवन पुत्र के कृत्रिम पवन के वेग ने हनुमत ध्वज को रहस्यमय ढंग से चहारदीवारी के बाहर ग्यारह हजार वोल्ट के विद्युत प्रवाहित तार पर पटक दिया। हरे बांस का ध्वज हाथ में लिए बेटा खाली पैर पत्थर सदृश खड़ा रहा। अचानक हुए जोरदार आवाज के साथ बिजली कट चुकी थी। सहसा हमें लगा कि उसकी सांस थम सी गई। हम तीनों की घीघी बंध चुकी थी। पर यह क्या हाथ से ध्वज छोड़ने के बजाय उसने फिर से ध्वज को उठा लिया। चूंकि ईश्वरीय कृपा से अनहोनी टल चुकी थी। बता दें कि तार का स्पर्श पताखा युक्त ध्वज से हुआ था। पताखा ने जान बचा दी। सीख मिली। घटना भूल से उतपन्न ईश्वरीय सबक का अहसास मात्र था।
तीसरी और महत्वपूर्ण घटना बीते शुक्रवार की है। मांझी के राम घाट स्थित हनुमान गढ़ी मन्दिर परिसर में सुंदर कांड पाठ के अनुष्ठान की तैयारी जोरों पर थी। सुबह का सवा छह बज रहा था। संत रामप्रिय दास जी महाराज ने समारोह स्थल पर लगे पाइप पंडाल के तिरछा खड़े एक खम्भे को सीधा करना चाहा। पर यह क्या। उसी पाइप में उनका दोनों हाथ चिपक गया। तत्क्षण हनुमान जी की प्रेरणा से अनायास ही मेरे मुंह से निकला। लाइन काट दो। तभी एक जानकार ने दौड़ कर तत्काल स्वीच ऑफ कर दिया। इससे पहले पवन गिरी ने लोहे की पाइप से चुपके संत जी को पकड़ कर हाथ छुड़ाने का असफल प्रयास भी किया। पर शायद ईश्वर को अनहोनी मंजूर नही था। उन्हें जीवन दान देना था। लाइन काटते ही हाथ तो छूट गया पर संत जी बेहोश होकर गिर पड़े। उठाया गया। इलाज हुआ। तभी अहसास हुआ कि अनुष्ठान का शुभारंभ नए हनुमत ध्वज स्थापना से होना चाहिए था जिसमें हम सबने भूल कर दी थी। दूसरी त्रुटि की बात यह कि संकल्प के बावजूद पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा का वाचन कराने से हम चूक गए। शायद कथा वाचन मामले में हमारा मौन समर्थन करने का दंड संत जी को मिल गया। खैर सबक के साथ अनुष्ठान सकुशल सम्पन्न हो गया।
यह तीनों घटनाएं हमें आगाह कर गईं की धार्मिक अनुष्ठान के आयोजन में जल्दबाजी तथा सुविधा वादी विचार त्याग कर पूरे मनोयोग से त्रुटि रहित पूजन करें। आपका कल्याण होगा।

नोट: यह विचार हिन्दुस्तान पत्रकार मनोज सिंह मांझी (सारण), बिहार के अपने अनुभव के आधार पर हैं। (के. के. सिंह सेंगर, प्र. संपादक)

K. K. Singh Sengar

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